साहित्य आजतक की महफिल में यतींद्र मिश्रा की किस्सागोई और मालिनी अवस्थी के सुरों ने जैसे किसी पुराने संदूक का ढक्कन खोल दिया हो. यहां बेगम अख़्तर की महकती यादें अब भी सांस लेती हैं. महफिल में उनके किस्से सिर्फ सुने नहीं गए, महसूस किए गए. दर्द, वफादारी, नफासत और सुकून की तलाश जैसे सब कुछ मानो फिर से ज़िंदा हो उठा.
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