कुत्तों का बुरा दौर तो रीतिकाल के बाद से ही शुरू हो गया था. शुक्लोत्तर युग के बाद तो 'कुत्ता' एक सामाजिक लेकिन बेहद चुटिली गाली बन गया. नायकों ने कुत्तों को इस योग्य भी नहीं समझा जिनके सामने नृत्य किया जा सके. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि कामुकता और गुस्से में जिस भीतर के जानवर के जागने की हम बात करते हैं वो कुत्ता तो नहीं होगा.
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